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“नेतृत्व विहीन होता बहुजन समाज”

 

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एक बहुत ही खूबसूरत गाना सुना था किसी फिल्म का कि- “तेरा राम जी करंगे बीड़ा पार उदासी मन काहि को करे”
उदास मन,और दुःखी मन को सायद कुछ चमत्कार की जरूरत थी कि राम रूपी शक्ति उनके कष्टों का  निवारण कर देगी तथा उनको कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी।लेकिन रामायण की कहानी के पात्रों के सिवा इस देश मे आज तक किसको  अपने दुखों और कष्टों से मुक्ति मिल पाई है?जिस तरह जटायु पक्षी ने रावण को सीता को ले जाने का विरोध किया और वह रावण से उलझ गया।लेकिन अन्ततः रावण ने उसके पर काट दिए।और जटायु पक्षी तड़पता रहा उसने तब तक अपने प्राण नहीं त्यागे जब तक कि श्री राम न आ जाएं और वह उनको सीता माता के रावण द्वारा अपहरण की सूचना न दे दे।वह तड़पता रहा,कहारता रहा और श्री राम के  आने की राह ताकता रहा।आखिर श्री राम सीता को ढूढ़ते ढूंढते जब हिम्मत हार गए थे।इंसानो से लेकर पशु -पक्षियों तक पूछते -पूछते वो थक गए थे और उनको सीता माता के गुम होने का कहीं से सुराख नहीं मिला।तो वो भटकते -भटकते आगे चलते रहे अंत में उनकी मुलाकात जटायु नामक पक्षी से होती है उससे  उसकी ऐसी  हालत के विषय मे पूछते हैं।तब जटायु उनको सब कुछ बता देता है और श्री राम को पता चल जाता है कि उनकी पत्नी को लंका का रावण ले गया है।फिर लंका पर आक्रमण होता है हनुमान जी का उदय होता है।सभी जानवर और पशु पक्षी इस युद्ध मे शामिल होते हैं अंत मे लंका पर विजय प्राप्त हो जाती है।श्री राम जिस सीता के लिए इतने व्याकुल थे जंगल की दर दर भटकते रहे पूरी लंका ध्वस्त कर दी और अंत मे सीता को ये कह कर अग्नि परीक्षा में झोंक दिया कि वो पति व्रता रही है कि नहीं।जिस पत्नी ने विकट  परिस्थितियों में अपने पति का साथ दिया।जंगल मे उनके साथ भटकती रही अंत मे वो अग्निपरीक्षा के कठिन इम्तिहान से गुजरी।और श्री राम पुरुषोत्तम कहलाये लेकिन माता सीता इतना झेलते हुए भी नारियोत्तम नहीं कहलाई?रामायण की नारी का ये हाल महाभारत में फिर दो कदम और आगे बढ़ गए नारी अपमान की जब भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण किया जाता है।महाभारत में तो ऐन वक्त पर भगवान कृष्ण द्रोपदी की इज्जत को बचा लेते हैं।और फिल्मों में भी हीरो ऐन वक्त पर इंट्री कर देता है और हिरोइन की इज्जत लूटने से गुंड़ों को रोक लेता ।महिलाओं के इर्द गिर्द घूमते  महाकाव्य, नाटक और कहानियां ,उपन्यास तथा फिल्में जो दरसातें हैं ओ हकीकत में घटित हो रही हैं।कम से कम भारत मे नारी के प्रति हो रहे शोषण और अत्याचार पर तो विराम लगना ही चाहिए था क्योंकि यहाँ की सँस्कृति कहती है”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”लेकिन ठीक इसके उलटा हो रहा है “यत्र नार्यस्तु लुटयन्ते रमन्ते तत्र नेता”।जटायु की कहानी को कहने का यही आशय था कि भारतीय नारी उस जटायु पक्षी की तरह  अपने लिए खुशगवार और सुरक्षित भविष्य तथा अच्छे दिनों का इंतजार कर रही है जिस प्रकार जटायु श्री राम के आने का इंतजार कर रहा था।
  एक तरफ अयोध्या में भव्य राम मन्दिर की तैयारी जोरों पर है 
दूसरी ओर राम के नाम पर देश में नफरत और हिंसा का माहौल खड़ा किया जा रहा है ।ऐसा प्रतीत होता है  कि राम सेवकों ,राम भक्तों को मर्डर करने का लाइसेंस मिल गया हो जब चाहे भीड़ किसी को भी खासकर अल्पसंख्यक उसमे से मुसलमान राम के नाम पर हो रही माब लिंचिंग के सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार हो रहे हैं।आश्चर्य तब होता है हिन्दू होकर भी देश के दलितों के साथ भी  अल्पसंख्यकों जैसा ही व्यवहार किया जा रहा है।आखिर जाएं तो जाएं कहाँ देश के दलित मन्दिर इनके लिए बंद, नलकूप,हेंडपम्प इनके लिए बंद,घोड़ी पर चढ़कर बरात ले जाना इनके लिए वर्जित,सवर्णों के सामने कुर्शी पर बैठकर खाने पर मर्डर ??और तो और संवैधानिक प्रतिनिधित्व पर भी धीरे -धीरे कैची चलना शुरू हो गयी है।117वॉ संविधान संशोधन बिल 56 साल से राज्य सभा मे पारित होकर लोकसभ में नहीं पास हो पाया है और 124 वां संविधान संशोधन बिल एक घंटे में पारित होकर 2 दिन में राज्यों में भी प्रभावी हो जाता है।आज भारत के दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यक नेतृत्व विहीन हो चुके हैं ।उनको शोषण,भेदभाव,अत्याचार,से मुक्ति दिलाने अब कोई राम नहीं आने वाला।उनको सिर्फ देश का संविधान ही बचा सकता है और इस वर्ग को अब डेढ़ के संविधान की रक्षा केलिए कमर कस लेनी चाहिए।  दलितों के हकों की लड़ाई लड़ने अब न डॉ0 आंबेडकर पैदा हुन्गे और न ही कांसी राम।देश के दलित वर्ग के नेता अब अपने परिवार को ही राजपरिवार में तब्दील करने लगे हैं 131 आरक्षित सांसदों की लोकसभा में दलित वर्गों,पिछड़े वर्गों,अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को खत्म किया जा रहा है लेकिन ये गूंगे बहरों की तरह संसद में बोझ बनकर बैठे हैं।पूना पैक्ट की अब पुनः समीक्षा करने का वक्त आ गया है।राजनीतिक आरक्षण सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के परिवार का ही कोटा बन गया है।कांसीराम के बाद जागा बहुजन मूवमेंट अब बिखरने लगा है जो चिंता का विषय है। राम मनोहर लोहिया और  अम्बेडकर के विचार धारा का गठजोड़ कुछ नईं उम्मीद की किरणों को लेकर आया था लेकिन मायावती ने उस पर पानी फेर दिया ।लगता है अब देश के दलित न घर के रहे न घाट के सिर्फ घुंगरू की तरह राजनीति के मंच पर बजते ही रह गए हैं।दलित वर्ग को सामाजिक पुनर्जागरण की जरूरत है  बिना समाज को जोड़े राजनीति के शिखर पर पहुंचने की कल्पना  मात्र दिवास्वप्न देखना होगा।
आई0 पी0 ह्यूमन
स्वतन्त्र स्तम्भकार
मो0–7599189297

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